सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

                                             आत्मलोचना

कभी-कभी ख़ुद के बारे में सोचकर हंसी आ जाती हैं। ऐसे मूरख हैं हम! लेकिन अगले ही पल सब कुछ ठीक हो जाता हैं और हम फिर निकल पढ़ते हैं वहीं गलतियाँ करने के लिए जिस पर अभी कुछ देर पहले ही हम धीर-गंभीर होकर विमर्श कर रहें थे। अब हमारे पास एक डॉकट्रीन हैं - इंसान तो ग़लतियों को पुतला हैं। उसके स्वभाव में ही ग़लती करना हैं। सचमुच आत्मलोचना जितना कठिन शब्द हैं यथार्थ में भी उतना ही दुरूह कार्य हैं। कहने में ये बड़ा ही आसान हैं कि अपनी पिछली ग़लतियों से सबक़ लेना चाहिए लेकिन क्या पिछली ग़लतियाँ एक जैसी थी, उसकी प्रकृति भी समान थी। नहीं। कोई भी दो ग़लतियाँ एक जैसी नहीं होती। आत्मलोचना के लिए मन का शांत होना पहली शर्त हैं। और यही सबसे कठिन समय होता हैं। ग़लती होने के बाद मन जल्दी शांत नहीं होता। और जब मन शांत होता हैं तो कई बार आत्मलोचना के लिए स्फूर्ति खत्म हो जाती हैं। शांत मन के बाद दूसरी शर्त हैं ख़ुद को डिफ़ेंड करने के हमारे स्वभाव पर काबू पाना। यहाँ भी मुश्किलें ही मुश्किलें हैं। हमें दूसरों की ग़लतियाँ बहुत जल्दी दिख जाती हैं और अपनी ग़लतियों को ढूँढने के लिए हमें माइक्रोस्कोप की ज़रूरत होती हैं। अब आते हैं तीसरी शर्त पर। क्या ये ज़रूरी हैं कि सारी ग़लतियाँ हमसे ही हो और दूसरों से कुछ भी नहीं। क्या आत्मलोचना वैक्युम में संभव हैं। उत्तर आपका ही शायद हाँ में ही होगा। आत्मलोचना के लिए एक ऐसे एनवायरनमेंट की आवश्यकता हैं जिसमें सभी व्यक्ति इस प्रक्रिया से गुज़रे। और यही पर सबसे बड़ी मुश्किल का सामना हैं। अधिकतर ऐसे हैं जिनके पास आत्मलोचना के लिए न समय हैं और न सोच। तो फिर आत्मलोचना एकपक्षीय नहीं हो सकता न। लेकिन क्या हम ये कहकर कि दूसरे नहीं कर रहें इसलिए हम भी नहीं करेंगे, चुप हो जाएँ। ये भी उतना ही ग़लत हैं। आत्मलोचना निरपेक्ष नहीं हो सकता। इसलिए हमें आत्मलोचना को परिस्थिति, व्यक्तियों और समूहो और सामर्थ्य के सापेक्ष ही  आत्मलोचना की क्रिया को देखना होगा। आत्मलोचना की प्रक्रिया के उपरांत एक अहम हिस्सा उस मानसिक स्थिति को नियंत्रण करना भी हैं जब हम अपने प्रतिक्रिया देने की गति को काबू में कर लेते हैं। तब कहीं जाकर आत्मलोचना की प्रक्रिया अपने महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचता हैं। लेकिन इस प्रक्रिया का अंत यही नहीं होता। बल्कि इसके बाद हमारे मानसिक और स्वाभाविक स्थिति में परिवर्तन आता हैं। अब सबसे आवश्यक हैं हमारा सजग होना। सजगता केवल ग़लती से बचने की नहीं बल्कि स्थिति की गहनता को समझते हुये अगले स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने के लिए।
तो साहब इतनी कठिन क्रिया के लिए कितने साधारण तरीके से हमें कह दिया जाता हैं आत्मलोचना के लिए। थोड़ा तो रहम कर दो भाई।

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

ज़िंदगी अपने तलाश में निकाल पड़ी हैं, नहीं मालूम मंज़िल क्या हैं पर हाँ रास्ता मज़ेदार ज़रूर हैं, सायादार पेड़ रास्ते पे पड़े न पड़े लेकिन हमसफर तो मिलते ही रहेंगे। अपना ख़्याल रखिए बहुत जल्दी फिर मुलाकात होगी।
                                                                @ नफीस

सोमवार, 24 सितंबर 2018


तुम अकेले क्यों सहती हो 

उदास रास्तों पर खामोशी से
तुम्हें चुप-चाप जब भी जाते देखा हैं
सब कुछ अकेले सहते देखा हैं
तब भी जब पिताजी डांटा करते थे
और अब भी जब जीजाजी डांटा करते हैं
तब भी जब हम भाई तुम्हें सुनाया करते थे
अब भी जब कि तुम्हारे बच्चे सुनाते हैं
तुम चुप-चाप सुन लेती हो इतना कुछ
ऑफिस में जब कभी बॉस सुनाते हैं
या घर आकर पत्नी सुनाती हैं
फट पड़ता हूँ मैं
नहीं देखता फिर पत्नी हो या बच्चे हो
पर तुमको देखा हैं मैंने चुप-चाप सुनते हुए
अकेले सब सहते हुए
दीदी कभी तो तुम भी फट पड़ो
हम सब पर गुस्सा निकालो
यूँ ही अंदर-अंदर दबे जाना
हम सब पुरुषों को भगवान बना देता हैं
तुम्हारा मौन रहना
सच पुछो तो  हमारा मर जाना हैं
एक बार तो दीदी प्रतिरोध करो
एक बार तो दीदी उद्घोष करो।
 
  # नफीस आलम
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 











 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

घर-वापसी

धारणाएं तब ही तक अच्छी होती हैं जब वो टूटती हैं। धारणाओं का स्थायी बना रहना ख़तरनाक होता हैं। मेरी ख़ुद अपने बारे में पहले धारणा ये थी कि मैं बहुत अच्छा लिखता हूँ। फिर बहुत जल्दी वो धारणा टूट गई। फिर मैं जान गया कि मैं औसत लिखता हूँ। मैंने लिखना कम कर दिया। अब मैं लिखता हूँ लेकिन इस सच को मानते हुए कि मुझे बहुत अच्छा लिखना नही आता। मैं फेसबुक की तरफ आकर्षित हुआ तो मेरे अंदर एक उधारणा  बनने लगी कि यह बड़ी दुनिया हैं ज़्यादा लोगों से संपर्क बनता हैं, ज़्यादा लोग आपको पढ़ते हैं और ज़्यादा लोगों को आप पढ़ सकते हैं। कुछ दिन सच में ऐसा हुआ भी। हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के बड़े लोगों से संपर्क भी हुआ। कुछ अच्छे कवियों और लेखकों को पढ़कर बहुत अच्छा लगा। लेकिन एक बात और हुई। मैं भी लाइक और कमेंट के चक्कर में आ गया। फेसबुक में फोटो पोस्ट करने पर सैकड़ों लाइक मिलते और कुछ पढ़ने योग्य लिखने पर दहाई भी पार होना मुश्किल हो जाता है। और गंभीर मुद्दों पर बात करने का स्कोप बहुत सीमित दिखा। इसलिए वापस अपने ब्लॉग पर लौट आया हूँ। आप कहते सकते हैं ठुकराए जाने के बाद आया हूँ।
तो किसी शायर ने कहा हैं और जगजीत ने अपनी मख़मली आवाज़ में उसे गुनगुनाया ...

ठुकराओ या मुझको प्यार करो मैं नशे में हूँ....इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ....।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

        द्वंद
एक द्वंद
अंदर भी, बाहर भी
अंदर न होने का
बाहर होने का
दोनो में भ्रम ही भ्रम
© नफीस आलम

सोमवार, 6 मार्च 2017


       आज़ादी 


हमने दी हैं आज़ादी चिड़िया को

नहीं कतरे हैं पंख उसके

उड़ने की पूरी आज़ादी हैं उसको

पिंजरे के अंदर

क्योंकि वो आसमान मे सुरक्षित नहीं हैं

उसके लिए आज़ादी इतनी हैं कि

वी फड़फड़ा सकती हैं अपने पंख

             : नफीस आलम


(गुरमेहर कौर को समर्पित) 

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

मशाल: सभ्यता को बचाने के लिए

उन साहित्यकारो वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, इतिहासकारों, लेखको, चिंतकों, मज़दूरों के नाम जिन्होने दरबारी होने और सत्ता के सामने सर ख़म करने से इंकार कर दिया

जब कभी उदासी छाती हैं
और शंका की घटाए घिर आती हैं
तुम मन मे विश्वास जगाते हो
कि अभी सब खत्म नही हुआ हैं
कि अभी भी सांस चल रही हैं
कि अभी भी कुछ लोग खड़े हैं 
हाथों मे मशाल लिए
कि अभी भी आस का दीपक बुझा नही हैं
कि अभी भी सब बिके नही हैं
कि अभी भी प्रतिरोध बाकी है
कि अभी भी इंसानियत पशुत्व पर हावी है
कि अब भी क्रांति का सूरज उगेगा 
और मै और तुम हाथ थामे चल सकेंगें
तिमिर से ज्योति की ओर।

बुधवार, 14 सितंबर 2011

Hindi hain hum vatan hain Hindostan hamara!

आज 14 सितम्बर हैं यानी हिंदी दिवस| इस अवसर मैं उन सब लोगों को बधाई देता हूँ जो ना केवल हिंदी में बल्कि सभी भारतीय भाषाओ के संरक्षण व प्रसार में अपना खून-पसीना एक कर रहे हैं| आज के दिन बरबस ही कुछ मुद्दे अपनेआप ही हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं| उनमे से एक प्रश्न जो हमारे सामने बार-बार पूछा जा रहा हैं वो ये हैं की क्या इस globalisation अथार्त भू-मंडलीकरण के दौर में अंग्रेजी भाषा को पूरे मनोयोग से स्वीकार कर विकास की दौड़ में शामिल हो जाये ? मैं हिंदी दिवस को किसी एक भाषा के दिवस पर नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओ के विजय दिवस के तौर पर देखता हूँ इसका कारण ये हैं की इस दिन भारत की संविधान सभा ने इस देश की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देते हुए इस देश की जन भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया| इस देश के लोगो के लिए हिंदी (और सभी भारतीय भाषाए) केवल एक भाषा नहीं हैं बल्कि वो प्रतीक हैं इस देश के इतिहास, उसकी संस्कृति और परंपरा की| हिंदी का सम्मान केवल हिंदी का नहीं अपितु सभी भारतीय भाषाओ का सम्मान हैं| आज दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्री प्रकाश दुबे जी एक लेख सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ जिसमे उन्होंने सूदूर दक्षिण भारत के एक केंद्रीय सरकार के कार्यालय में किये जा रहे प्रयास के सम्बन्ध में लिखा हैं | उन्होंने बड़े कटु शब्दों में सरकारी कार्यालयों में खानापूर्ति की आलोचना के हैं| आज ही NDTV 24X7 में चल रही एक चर्चा में श्री जावेद अख्तर ने बहुत ही सटीक बात कही हैं | उन्होंने कहा की भारतीय भाषाए भारतीय संस्कृति की वाहक हैं | हाँ ये ज़रूर हैं की English enables us to access the vast literature of  other world languages and also access to technology | लेकिन यह मानना की सभी अंग्रेजी बोलने वाले बुद्धिजीवी हैं और काबिल हैं तो ये एक सिकुड़ी हुई सोच हैं क्योंकि हर अँगरेज़ intellectual और civilized नहीं होता | एक भाषा के तौर पर अंग्रेजी भारतीय भाषाओ की जगह नहीं ले सकती| हिंदी, उर्दू, बंगला, मराठी, गुजरती, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, संथाली, उड़िया, पंजाबी, कोंकणी केवल एक भाषा समूह नहीं हैं वो इस देश की संस्कृति का हिस्सा हैं| ये भाषाए हमारे लिए गौरव का विषय  हैं| इनका सम्मान करना इस देश का सम्मान करना हैं| अंग्रेजी में बात करने को काबिलियत का प्रतीक मानना बहुत बड़ी भूल हैं | आइये प्राण ले की ham apni भाषा और संस्कृति के संरक्षण में अपना योगदान देंगे और apni भाषी बोलने और लिखने में शर्मायेंगे नहीं और apni भाषा के साथ साथ इस देश की दूसरी भाषा का भी सम्मान करेंगे| साहित्य अकादेमी ने एक बहुत ही महती कार्य को apne जिम्मे लिया हैं| वो सभी भारतीय भाषाओ के साहित्य को हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद कर हमारे लिए सभी भारतीय भाषाओ के साहित्य को सुलभ बना रहा हैं| आप भी इसमें अपना योगदान दीजिये| धन्यवाद |

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

sabhyta kee naganta

एक उदास शाम में, मौन-मूक दृष्टी से  टीवी में,
देख रही थी पति के बाजू में, वो एक कार्यक्रम डिस्कवरी में |
अंतर्द्वंद से घिरे मस्तिष्क में, लाखो सवालों के कौंधने के बीच में,
       हिंसा, बलात्कार और पीड़ा के समुद्र में,
       दिन-भर की व्यस्तताओं से lade,
       aate -जाते ख्यालो के बीच में,
आ रहा था आफ्रीकी आदिवासी " बांटू" पर कार्यक्रम एक,
" ये आदिवासी भी कैसे नग्न होते हैं, कैसे असभ्य?"
       इतना ही कहा था उसके  पति ने,
       और फट पड़ी थी वो गुस्से में,
वर्षो से सुप्त ज्वालामुखी थी, आज पुनः जाग गयी थी,
और उसके मुख से निकल पड़ा था, आज लावा असंतोष का,
      कौन सभ्य हैं और कौन असभ्य,
       वो जिन्होंने किया था प्रयास,
      द्रौपदी को निवस्त्र करने भरी सभा में
     और वो जिन्होंने उसे होते देखा था,
या वो भेड़िया नेता सभ्य हैं जिसने लूटकर इज्ज़त भी,
उस बांदा की अबोध को डलवाया जेल में,
     या वो जो रोज़ उसके देह को,
     कामुक नज़रो से बेधते हैं, सभ्य हैं?
और तुम जो हिंसा को हथियार बनाकर,
अपनी अर्धांगनी पर, चलते हो अपना शासन, सभ्य हो?
     सुनो दे दो mere प्रश्नों का उत्तर,
     क्या कभी सुना उन आदिवासियों में,
किसी ने स्त्री की लूटी हैं अस्मत, नहीं इन नग्न लोगो में,
स्त्री उपभोग का विषय नहीं हैं, स्त्री मॉडल नहीं हैं,
स्त्री पीड़ित नहीं हैं, क्या ये इसलिए असभ्य हैं?
क्यों चुप हो तुम? तुम भी तो सभ्य हो,
     क्या विडम्बना हैं देखो?
वे जो सभ्य होकर भी असभ्य कहलाते हैं,
और तुम जो असभ्य होकर भी सभ्य कहलाते हो?
                          नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति नागपुर द्वारा आयोजित काव्य-पाठ प्रतियोगिता २०११ में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित कविता| कृपया अपने विचारो से अवगत कराये| धन्यवाद |



 

बुधवार, 15 सितंबर 2010

Hindi diwas aur sarkari aayojan

कल हिंदी दिवस था और शायद इसे बताने कि ज़रूरत भी नहीं हैं | हमारे कार्यालय में भी एक सरकारी आयोजन का होना अनिवार्य था आखिर मंत्रालय और मुख्यालय के आदेश का पालन जो करना हैं | प्रति वर्ष हम इसका आयोजन पूरी सरकारी निष्ठां के साथ करते हैं | बड़े अधिकारियो का  उबाऊ भाषण और इस में चार चाँद लगाते  झूठे आंकड़े और कर्मचारियों का आडम्बरपूर्ण प्रतिज्ञा के वे पूरे मनोयोग से हिंदी में कार्य करते रहेंगे | चूंकि मैं हिंदीजीवी हूँ इसलिए कार्यालय में इसके आयोजन की ज़िम्मेदारी मुझ पर ही होती हैं | इस बार मैंने सोचा क्यों ना कुछ लीक से हटकर  किया जाए? भाषण तो ऐसे भी सरकारी कार्यालयों में बार-बार होने वाली बेहद उबाऊ और बोझिल संस्कार हैं जिसे सुनना कर्मचारियों कि नियति  हैं | इसलिए इस बार मैंने इसके स्थान पर एक संगोष्टी/ परिचर्चा का आयोजन करने की  सोची | अपने एक मित्र हैं एक दैनिक समाचार-पत्र में श्री हेमधर शर्मा जो एक प्रतिभाशाली और विचारवान कवि भी हैं, को फटाफट कॉल लगाया और उनसे दो और पत्रकारो  को निमंत्रण के लिए अनुरोध किया| संगोष्टी के विषय का चयन भी मैंने ही किया था " हिंदी ही क्यों !" याद रखिये मैंने विषय के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं लगाया हैं बल्कि विस्मयबोधक चिन्ह लगाया हैं | दो और वक्ता जो कवि भी हैं और पत्रकार भी | एक थे श्री पुष्पेन्द्र ' फाल्गुन ' जो एक हिंदी साहित्यिक  पत्रिका "फाल्गुन विश्व" के संपादक हैं और दुसरे श्री उमेश यादव ये भी एक एक हिंदी दैनिक से जुड़े हैं और ये भी संयोग ही था कि इन तीनो को मैंने हाल ही में लोहिया जन्मशताब्दी समारोह के दौरान एक कवि सम्मेलन में सुना था और सच ये था कि मैं इन से बहुत प्रभावित हुआ था | यहाँ पर कुछ नया करने के चक्कर में मैंने एक भूल कर दी | मैं भूल गया था कि एक सरकारी कार्यालय में सरकारी लोगो के बीच creativity मायने नहीं रखती | वे कुछ नवीन और विचारशील क्रिया में विश्वास नहीं रखते | उनका सारा समय घडी की  तरफ देखने में काटने वाला था | तो परिणाम वही हुआ जो सरकारी प्रयासों ने हिंदी के साथ किया हैं | एक नितांत विचारशील प्रक्रिया को सरकारी खानापूर्ति में बदल डाला |  कल ही एक दूसरी घटना भी मेरे साथ घटी | मेरे एक सहकर्मी हैं जिनका नाम यहाँ लेना इसके प्रयोजन के लिए महत्वहीन हैं, उनके और मेरे जिम्मे सूचना का अधिकार अधिनियम के पालन की  ज़िम्मेदारी हैं  जो हमारे बहुत से जिम्मेदारियों में से एक हैं | चूंकि इस अधिनियम के अंतर्गत जो नियम बनाये गए हैं उसमे सूचना अधिकारी द्वारा दिए जाने वाले जवाब का मसौदा नहीं हैं इसलिए अधिकतर कार्यालयों ने और अधिकारियो ने अलग-अलग मसौदे अपनाये हैं | इस सम्बन्ध में हमारी चर्चा हमारे सूचना अधिकारी से हो रही थी कि हमें किस मसौदे में जवाब देना चाहिए? मेरा मत था कि पत्र के स्वरुप में ही होना चाहिए लेकिन मेरे सहकर्मी का मत था कि पत्र के स्वरुप में लिखेंगे तो किसी भी ऐरे-गैरे को sir कहना पड़ेगा जो मेरी दृष्टि में उचित नहीं हैं और उस पर उन्होंने सूचना अधिकारी को मक्खन  लगते हुए ये भी जोड़ दिया कि सर आपके स्तर का अधिकारी किसी भी अल्लू-लल्लू को सर कहे ये अच्छा नहीं लगेगा आप सोच रहे होंगे कि मैंने इस प्रसंग को हिंदी दिवस के कार्यक्रम के साथ क्यों जोड़ा ? दरअसल मेरे सहकर्मी के विचार सिर्फ उस व्यक्ति या उस प्रसंग के सम्बन्ध में ही विचार नहीं थे ये विचार बहुसंख्यक सरकारी भारतीयों के विचारो का प्रतिनिधित्व करते हैं | यह सरकारी मानसिकता और व्यवहार उस औपनवेशिक मानसिकता को इंगित करता हैं जिसके कुठाराघात से हिंदी भारत कि राजभाषा के रूप में लहूलुहान हैं | सरकारी लोग आज भी उस औपनवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं जो एक भारतीय को पशु या कीड़े-मकौड़े से ज्यादा कुछ नहीं समझता हैं | वे आज भी ये नहीं समझ पाए हैं कि स्वतन्त्र होने के बाद् हमने एक लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था चुनी हैं जिसमे एक आम आदमी भी शक्ति रखता हैं और उसका भी अपना सम्मान और dignity हैं जो अधिकार उसे इस देश का संविधान प्रदान करता हैं कोई सरकारी संगठन या अधिकारी नहीं | इसलिए इस देश में कोई आदमी भी अल्लू-खल्लू नहीं हो सकता | औपनवेशिक मानसिकता सरकारी व्यक्ति के अन्दर अभिजात्य होने का भ्रम पैदा करती हैं वो भ्रम जो उसे इस देश कि बहुसंख्यक जनता से अलग कर देता हैं जो स्वयं को पब्लिक servant न समझकर स्वयं को ruler और आम जनता को ruled समझता हैं | हिंदी भी  इसी सरकारी मानसिकता का शिकार हो गयी हैं | एक आम भारतीय के या एक  तथा-कथित अल्लू-खल्लू के द्वारा व्यवहार में लाये जाने वाली भाषा में वो अपना कामकाज कैसे कर सकते हैं | यदि उन्होंने हिंदी में कोई पत्र या नोट लिख दिया तो उनके और उस अल्लू-खल्लू के बीच में अंतर क्या रह जायेगा | उनका अभिजत्यापन कहाँ जायेगा ? बंधुओ यही बीमारी हैं और हमें इसी  मानसिकता के विरुद्ध ही संघर्ष करना होगा | ये आम आदमी के  बोलने और लिखने वाली भाषा ही इस देश की  तकदीर हैं उसका भाग्य भी | और यही भाषा इस देश को विकास के पथ में ले जाएगी | क्योंकि इसकी शक्ति किसी सरकारी आदेश के ज़रिये से नहीं आती ये तो इस देश के करोड़े लोगो से आती हैं | जिस आम आदमी की  शक्ति ने अपने समय के सर्वशक्तिमान साम्राज्य को  पस्त कर दिया तो वो इन भारतीय अंग्रेजो को भी मिटा देगी | अंत में भारत के उस आम अल्लू-खल्लू को जिसके संघर्ष  ने हमें यहाँ तक पहुँचाया हैं कोटि-कोटि प्रणाम |

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

HINDI HI BHARAT KA BHAVISHYA HAI!

   महाराष्ट्र की विधान सभा में जो कुछ हुआ उससे पूरे देश में प्रतिक्रिया हो रही है | न केवल उत्तर भारत वरन भारत के दुसरे हिस्सों से भी इसको लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं| ऐसा नहीं है के मैं देर से जागा हूँ लेकिन मेरी प्रतिक्रिया विस्तृत होनी चाहिए शायद इसलिए मैंने इतना समय लगा दिया प्रतिक्रिया देने में| प्रतिक्रिया देने से पहले डिस्क्लेमर: इस लेख का राजनीती से कोई लेना-देना नहीं है और  लेखक के विचार पूर्णतः निजी हैं|
भाषा के नाम पर राजनीती की दुकान में कोई नया उत्पाद बाज़ार में नहीं आया हैं| दरअसल राजनीती के बाज़ार में एक नयी  दुकान खुली है और इसका नाम मनसे यानी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना हैं| और इस नयी दुकान के मालिक है श्रीमान राज ठाकरे जो पहले अपने चाचा श्री बाल ठाकरे जी की दुकान शिवसेना चलाने में उनकी सहायता किया करते थे| लेकिन राजनिति के बाज़ार में अत्यधिक त्रीव प्रतियोगिता होने के कारन मुनाफा कम होने लगा था और ऐसी स्तिथि में श्री राज ठाकरे के पास सिवाय अपनी नयी दुकान खोलने के आलावा कोई विकल्प भी नहीं था|  ऐसे में श्री राज ठाकरे के पास पुराने उत्पाद को बेचने के लिए कुछ नया विज्ञापन दिखाना आवयश्क था| फिर नयी-नयी दुकान होने के कारण कोई RISK लेना भी अनुचित था| भई नुकसान हुआ तो भरपाई मुश्किल हैं| इसलिए अपने ताऊ का विश्वसनीय और TIME TESTED नुस्खा ही लिया जाये तो कुछ मुनाफा हो सकता था| अब प्रश्न यह था की नफरत का कवर इस बार किसको बनाया जाये अब बॉम्बे अर्र ...... मुंबई में दक्षिण भाषी .....(उनकी भाषा में लुंगी) की संख्या तो अधिक रही नहीं और एक ही कवर में बार बार उत्पाद जल्दी बिकता नहीं हैं तो नफरत के लिए कोई नया कवर ढूँढा जाये | अंग्रेजी का विरोध करेंगे तो ये पत्रकार तुरंत टीवी और समाचार पत्रों में वो अंग्रेजी स्कूल दिखायेंगे (सामान्य ज्ञान के लिए बता दूं बॉम्बे SCOTTISH ) जहाँ मालिक के बच्चे पढ़ते हैं | और अंग्रेजी का विरोध करने से पिछड़ा दिखने का खतरा भी हैं| इसलिए इस बार नफरत के लिए नयी भाषा और नए लोग ढूंढें ....और वो हिंदी से अच्छा क्या हो सकता हैं| आखिर भारत की सबसे बड़ी संख्या में बोली जाने वाली भाषा हिंदी हैं| वैसे भी अंग्रेजी बोलने वालो की संख्या इस देश में ज्यादा नहीं हैं| ज़ाहिर हैं जिस भाषा के बोलने वालो की संख्या ज्यादा होगी उसका विरोध करने से लोकप्रियता भी उतनी अधिक मिलेगी| अरे भई ताऊ की दुकान भी तो COMPETITION में हैं और अपना उत्पाद भी कौन सा मुंबई के बाहर बेचना हैं| अब सवाल विज्ञापन का हैं तो विधान सभा और अबू असीम आज़मी से अच्छा और भी क्या सकता हैं | सत्ताधारी दल भी तो टैक्स में छूट देने का वायदा कर चुकी हैं| तो भैया .......भैया नहीं, हीं तो मनसे के आका नाराज़ हो जायेंगे हाँ तो भाऊ अपनी दुकान तो ठीक-ठाक चल निकली हैं | भगवन ने चाहा तो ताऊ की दुकान के भी ग्राहक अपनी दुकान से सौदा लेने लंगेंगे बस विज्ञापन अच्छा होना चाहिए| ऐसे भी अपन ने कौन सी दुकान धर्म-करम के लिए खोली हैं जो स्थान और समय का लिहाज़ रखा जाये | गरीबो और पिछडो के नाम पर इस देश में पहले से ही बहुत सी दुकाने हैं| आज १३ कल ६३ होंगे |
STATUTORY WARNING : आप कितना भी प्रयास करे हिंदी का प्रसार नहीं रोक सकते| कुछ वर्षो पहले दक्षिण के हमारे कुछ भाइयो ने भी किया था परिणाम कुछ नहीं निकला | उल्टा दिल्ली में आकर हिंदी में बात करनी पड़ रही हैं| आखिर क्या करे राजनीती का बाज़ार ही कुछ ऐसा हैं| एक बात आपको बता दे अच्छा आप सब नोट भी कर ले भाषा राजनीती और सरकारों से नाही बनते हैं और नाही चलते हैं भाषा को लोग चलते और बनाते हैं| हिंदी को राजनीतिज्ञों ने नहीं लोकप्रियता दिलाई हैं| हिंदी को लोकप्रियता हिंदी बोलने और लिखने के इच्छा रखने वाले और हिंदी से प्रेम करने वालो ने दिलाई हैं और नफरत कभी प्रेम से जीत नहीं सकता | भविष्य की इबारत हिंदी में लिखी हैं आप कुछ भी कर ले आप हिंदी के प्रसार को नहीं रोक पाएंगे और यदि इसका नमूना देखना हो अपने बच्चो को बात करता हुआ सुन ले| विदेशी व्यापारियों को को भी हिंदी की बढती शक्तियों का एहसास हो गया इसलिए पेप्सी ये प्यास हैं बड़ी और YOUNGISTAN कहकर अपने उत्पाद बेच रहा हैं क्योंकि भारत में उभरते बाज़ार की भाषा हिंदी हैं| हाँ तो भैय्या बॉम्बे( यह मैं अपना विरोध दर्ज करने के लिए कह रहा हूँ) या महाराष्ट्र भारत की सीमा से बहार तो है नहीं और जब इससे पाकिस्तान और अफगानिस्तान तो बच नहीं सके तो आप कैसे बच पाएंगे| इसीलिए हम कहते हैं अपने उत्पाद को बदल डालिए और देश प्रेम और हिंदी को अपनाइए फिर देखिये आपकी दुकान पूरे देश में चलेगी| हिंदी ही भारत का भविष्य हैं|

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

प्रेम

एंटन चखोव की कहानी " लव" की प्रेरणा से रचित

क्या मैं प्रेम को सीमा में बाँध सकता हूं?
क्या प्रेम सीमा में बंध सकता हैं?
क्या शून्य के बाहर कुछ नही हैं?
क्या वृत्त के बाहर कुछ नही हैं?
शून्य इसलिए तो शून्य हैं,
क्योंकि वह सीमायें तय करता हैं,
शून्य कुछ और नही हैं,
भय हैं,
भय हैं अस्तित्व के कहीं और समाहित होने का,
तो क्या अस्तित्व सीमा में बंध सकता हैं?
तो क्या सीमित अस्तित्व शून्य नहीं हैं?
इसलिए मैंने शून्य को स्वीकर नही किया है,
इसलिए मैंने शून्य के विरुद्ध विद्रोह किया है,
क्योंकि मैं अपनी कल्पनाओं के पक्षी को
पिंजरे में बंधने नही दूँगा,
मैं प्रेम को सीमाओं में बंधने नही दूँगा,
और तोड़ दूँगा सब जंजीरे!





गुरुवार, 14 मई 2009

भारतीय राजनितिक पार्टियों में लोकतंत्र के कमी|

१५वे लोकसभा का चुनाव संपन्न हो चुका हैं और १६ मई को परिणाम भी जाएगा| चुनाव के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर निशिंत रूप से चुनाव आयोग बधाई का पात्र हैं परन्तु इस सफलता से फूल कर कुप्पा होने का समय नही हैं| भारतीय लोकतंत्र को अभी और कई मील के पत्थर पार करने हैं| जो नई चुनौती मुंह फाड़े खड़ी हैं उनमे से एक महत्वपूर्ण चुनौती हैं राजनितिक पार्टियों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का विकास| जब राजीनीतिक पार्टियों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का आभाव होगा तो वो देश में लोकतंत्र को कैसे मज़बूत करेंगे? कोई राजनितिक पार्टी हो चाहे वो कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या क्षेत्रीय राजनितिक पार्टियां सभी जगह भाई भतीजावाद हावी हैं| एक साधारण कार्यकार्ता पार्टी के उच्चतम पदों पर नही पहुंच सकता जबकि उच्च पदों पार बैठे व्यक्ति की संताने बिना किसी प्रतिभा और परिश्रम के पहुंच जाती हैं|
वो बच्चा जो उस मस्जिद में खेल रहा है,
अपनी मासूम दुनिया में गम है,
जो बड़े लोगो की दुनिया से अनजान है,
जिसकी दुनिया में बेपरवाही, बफिक्री नेमत हैं,
जिसके लिए मोहब्बत दीन हैं,
जिसकी भाषा में नफरत शब्द ही नही हैं ,
जुबान में जिसके पीर की तासीर हैं,
जो सम्प्रदायवाद क्या कोई भी वाद को नही जानता हैं,
जो दहशतवाद को नही पहचानता हैं,
जिसके लिए पीपल का पेड़ आसमान की सीढ़ी हैं,
जिसके लिए होली रंगों का तिहार हैं,
जिसके लिए ईद मिठाई का तिहार हैं,
एक दिन मस्जिद की दीवार से लगकर सीढियों पर चढ़ रहा था,
सोच रहा था अपने नन्हे हाथो से आज,aa
आसमान को छू लेगा,
अचानक एक बम फटा,
और वो बच्चा खुदा के पास था,
नीचे ज़मीन की तरफ देख रहा था ,
और ठहाके लगा कर ज़ोर से हंस रहा था,
कह रहा था बम पर मज़हब लिखा था,
पूछ रहा था इंसानों से एक सवाल,
मज़हब तो खुदा का रास्ता बताता है,
तो क्या बम हिंदू और मुसलमान बनाता हैं ?

सोमवार, 2 मार्च 2009

रिश्तों में जब सिलवटे पड़ जाती है
तो वो भी कपड़ो की तरह जिस्म से उतर जाते हैं
यादों की कतरनों से रिश्तों की चादर बुनते हैं,
और फिर उनसे रिश्तों की गर्माहट की उम्मीद करते हैं,
लोग तो दो लेकिन न जाने,
कितनी जिंदगियां जीते हैं,