मंगलवार, 8 सितंबर 2009

प्रेम

एंटन चखोव की कहानी " लव" की प्रेरणा से रचित

क्या मैं प्रेम को सीमा में बाँध सकता हूं?
क्या प्रेम सीमा में बंध सकता हैं?
क्या शून्य के बाहर कुछ नही हैं?
क्या वृत्त के बाहर कुछ नही हैं?
शून्य इसलिए तो शून्य हैं,
क्योंकि वह सीमायें तय करता हैं,
शून्य कुछ और नही हैं,
भय हैं,
भय हैं अस्तित्व के कहीं और समाहित होने का,
तो क्या अस्तित्व सीमा में बंध सकता हैं?
तो क्या सीमित अस्तित्व शून्य नहीं हैं?
इसलिए मैंने शून्य को स्वीकर नही किया है,
इसलिए मैंने शून्य के विरुद्ध विद्रोह किया है,
क्योंकि मैं अपनी कल्पनाओं के पक्षी को
पिंजरे में बंधने नही दूँगा,
मैं प्रेम को सीमाओं में बंधने नही दूँगा,
और तोड़ दूँगा सब जंजीरे!





गुरुवार, 14 मई 2009

भारतीय राजनितिक पार्टियों में लोकतंत्र के कमी|

१५वे लोकसभा का चुनाव संपन्न हो चुका हैं और १६ मई को परिणाम भी जाएगा| चुनाव के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर निशिंत रूप से चुनाव आयोग बधाई का पात्र हैं परन्तु इस सफलता से फूल कर कुप्पा होने का समय नही हैं| भारतीय लोकतंत्र को अभी और कई मील के पत्थर पार करने हैं| जो नई चुनौती मुंह फाड़े खड़ी हैं उनमे से एक महत्वपूर्ण चुनौती हैं राजनितिक पार्टियों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का विकास| जब राजीनीतिक पार्टियों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का आभाव होगा तो वो देश में लोकतंत्र को कैसे मज़बूत करेंगे? कोई राजनितिक पार्टी हो चाहे वो कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या क्षेत्रीय राजनितिक पार्टियां सभी जगह भाई भतीजावाद हावी हैं| एक साधारण कार्यकार्ता पार्टी के उच्चतम पदों पर नही पहुंच सकता जबकि उच्च पदों पार बैठे व्यक्ति की संताने बिना किसी प्रतिभा और परिश्रम के पहुंच जाती हैं|
वो बच्चा जो उस मस्जिद में खेल रहा है,
अपनी मासूम दुनिया में गम है,
जो बड़े लोगो की दुनिया से अनजान है,
जिसकी दुनिया में बेपरवाही, बफिक्री नेमत हैं,
जिसके लिए मोहब्बत दीन हैं,
जिसकी भाषा में नफरत शब्द ही नही हैं ,
जुबान में जिसके पीर की तासीर हैं,
जो सम्प्रदायवाद क्या कोई भी वाद को नही जानता हैं,
जो दहशतवाद को नही पहचानता हैं,
जिसके लिए पीपल का पेड़ आसमान की सीढ़ी हैं,
जिसके लिए होली रंगों का तिहार हैं,
जिसके लिए ईद मिठाई का तिहार हैं,
एक दिन मस्जिद की दीवार से लगकर सीढियों पर चढ़ रहा था,
सोच रहा था अपने नन्हे हाथो से आज,aa
आसमान को छू लेगा,
अचानक एक बम फटा,
और वो बच्चा खुदा के पास था,
नीचे ज़मीन की तरफ देख रहा था ,
और ठहाके लगा कर ज़ोर से हंस रहा था,
कह रहा था बम पर मज़हब लिखा था,
पूछ रहा था इंसानों से एक सवाल,
मज़हब तो खुदा का रास्ता बताता है,
तो क्या बम हिंदू और मुसलमान बनाता हैं ?

सोमवार, 2 मार्च 2009

रिश्तों में जब सिलवटे पड़ जाती है
तो वो भी कपड़ो की तरह जिस्म से उतर जाते हैं
यादों की कतरनों से रिश्तों की चादर बुनते हैं,
और फिर उनसे रिश्तों की गर्माहट की उम्मीद करते हैं,
लोग तो दो लेकिन न जाने,
कितनी जिंदगियां जीते हैं,